परिव्राजक शंकर एक गृहस्थ के द्वार पर भिक्षा मांगने पहुँचे।आवाज लगाई
भिक्षाम देहि!!
घर ब्राह्मण स्त्री ने जब यह सुना तो वह अत्यन्त दुखी हो उठी। आज तो घर मे जरा भी अन्न नहीं, वटुक को क्या दे?
भिक्षाम देहि !! दूसरी आवाज सुनाई दी।
उसने शीघ्रता से घर में दृष्टि दौड़ाई।उसे एक आँवला आले में रखा दिखाई दिया।वह सोचने लगी इसे दे तो दूँ पर क्या इससे वटुक का भोजन निर्वाह होगा?

उन दिनों परम्परा अनुसार वटुक केवल पाँच सात घर जाकर भिक्षा मांगते थे और आवाज भी तीन बार लगाते थे। न मिलने पर आगे बढ़ जाते थे।और जिस दिन कुछ न मिले तो भूखे पेट ही रहकर धर्मकृत्य में संलग्न रहते थे।
तब हजार साल पहले के भिक्षुक आज के साधु वेषधारी माँगने वालों की तरह नहीं होते थे जो दरवाजे पर अड़े रहते हैं और अक्सर, “तेरी ग्रह दशा खराब है बच्चा!” ऐसा कह कर डराते भी हैं।
ब्राह्मणी ने आँवला लिया और द्वार पर खड़े वटुक शंकर की ओर न देखते हुए कहा ,आज घर में आपको देने के लिए कुछ भी नहीं क्या करूँ बस ये आँवला ही है इसे स्वीकारें ।यह कह कर उनकी झोली में आँवला डाल दिया।
शंकर का मन यह देख सुन कर द्रवित हो गया। अहो कितनी पुण्यात्मा है धर्मनिष्ठ है यह साध्वी। फिर भी इतनी निर्धनता !!
उनके मन में अचानक विचार आया कि दारिद्र्य दुख भय हारिणी सदाआर्द्रचित्ता भुवनेश्वरी लक्ष्मी से ही प्रार्थना की जाए कि वे इस सद्गृहस्थ की निर्धनता का निवारण करें। और ऐसा विचार मन में आते ही उनकी वाणी से महालक्ष्मी की स्तुति छन्द बद्ध हो कर मुखरित होने लगी:
अङ्ग हरे: पुलक भूषणमाश्रयन्ती …
इस स्तुति को ही कनक धारा स्तोत्र कहा गया है जिसके पाठ व विधिवत लक्ष्मी उपासना की सलाह साधक को धन ऐश्वर्य सम्पन्न बनने के लिए अक्सर दी जाती है।
और इधर ब्राह्मणी के घर स्वर्ण आँवले की वर्षा होने लगी। उसकी दरिद्रता सदैव के लिए दूर होगई।
अब आप कहेंगे कि फिर तो इसी कनक धारा स्तोत्र का ही पाठ करना चाहिए।
पर मेरा निवेदन कुछ और है। उक्त साध्वी ब्राह्मणी को लक्ष्मी प्राप्ति किस कारण से हुई? पाठ तो शंकर ने किया था। उसे लक्ष्मी प्राप्ति हुई दान की श्रेष्ठ भावना से।
लक्ष्मी रहती हैं विष्णु के साथ।विष्णु हैं पालन पोषण के देवता। योगक्षेम का भार उठाने वाले । इसलिए जो साधक दूसरों के जीवन के पोषण के लिए जितनी मदद करेगा,दान रूप से सहायता रूप से, उस साधक पर लक्ष्मी जी उतना ही अधिक प्रसन्न होंगी।
इस लिए यदि व्यक्ति को टिकाऊ लक्ष्मी प्राप्त करना है तो दान करना दूसरों की यथाशक्ति मदद करना सीखें।ऐसे दान व सहायता कार्य में अहंकार न हो ,देने वाला मैं नहीं ईश्वर है ये भाव रखें।
मन्त्र जप में या हरेक अनुष्ठान में दान भी शामिल होता है जिसकी खानापूर्ति हम अक्सर मन्दिर में देकर करलेते हैं। मन्दिर को ईश्वर का साकार प्रतीक मानें तो ईश्वर को दान कैसा?,उसे तो सादर अर्पण ही कर सकते हैं ।
वास्तविक दान तो जात पात रहित केवल जरूरतमन्द को दी गई अन्न आश्रय औषधि वस्त्र सांत्वना शब्द सेवा ही है।
अब मन्त्र जप की बात करें ।
किस मन्त्र के जप से धन वृद्धि होती है?
धन जीवन यापन के लिए आवश्यक है।इसलिए चारों पुरुषार्थों -धर्म अर्थ काम और मोक्ष में -अर्थ अर्थात धन दूसरे क्रम पर है।
धन वृद्धि के लिए तो प्रयत्नपुरुषार्थ ही सर्व श्रेष्ठ जीवन मन्त्र है। मन की संकल्प शक्ति और ईश्वरीय कृपा के लिए प्रार्थना करना चाहिए। लक्ष्मी को केवल धन रुपये पैसे नहीं समझें ।लक्ष्मी व्यापक हैं, स्त्री पुत्र पुत्री कीर्ति सम्मान विवेक बुद्धि क्षमा विनय इत्यादि सभी श्रेष्ठ भाव भी लक्ष्मी रूप ही हैं।
देवताओं के मन्त्र जप में पहली समस्या शुद्ध उच्चारण की है। मन्त्र एक तरह के ऊर्जा के बीज हैं इसलिए इनका उपयोग वैसी ही सावधानी से करना होता है।
धन प्राप्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ तो आपके जो भी पारंपरिक इष्टदेव हैं,कुलदेव देवी हैं उनकी उपासना करना चाहिए और उनसे ही मांगना चाहिए।
विशेष उपासना करना ही चाहें तो ऋग्वेद के श्री सूक्त का अपनी मातृ भाषा में अर्थ सहित संस्कृत पाठ करने से कामना पूर्ति में सहायता मिलती है।
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