Janmashtami 2025 : जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

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Janmashtami 2025 : जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

By admin

August 12, 2025

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव, जन्माष्टमी, हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पर्व पूरे देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। माना जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु के आठवें अवतार, श्रीकृष्ण का जन्म कंस के अत्याचारों से धरती को मुक्त करने के लिए हुआ था। Janmashtami 2025 का त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष उत्साह लेकर आ रहा है, जब वे अपने आराध्य के जन्मोत्सव में लीन होंगे। इस ब्लॉग पोस्ट में हम आपको जन्माष्टमी 2025 से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण जानकारी देंगे, जिसमें तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस पावन पर्व का महत्व शामिल है।

जन्माष्टमी 2025 कब है? (Janmashtami 2025 Kab Hai)

हर साल, जन्माष्टमी का पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। यह तिथि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय रोहिणी नक्षत्र के संयोग से और भी खास हो जाती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, हर साल इसकी तारीख बदलती रहती है।

जन्माष्टमी 2025 तिथि और समय (Janmashtami 2025 Date and Time)

साल 2025 में, Janmashtami 2025 का पावन पर्व इस प्रकार रहेगा:

हिंदू पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि का आरंभ और समापन समय भी पूजा के लिए महत्वपूर्ण होता है:

रोहिणी नक्षत्र का समय:

भगवान कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी के दिन रोहिणी नक्षत्र का होना अत्यधिक शुभ माना जाता है। 2025 में रोहिणी नक्षत्र का समय इस प्रकार है:

इस प्रकार, 17 अगस्त 2025 को अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों का संयोग बन रहा है, जो जन्माष्टमी के पर्व के लिए अत्यंत शुभ है।

जन्माष्टमी 2025 शुभ मुहूर्त (Janmashtami 2025 Shubh Muhurat)

जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि को हुआ था, इसलिए रात में कृष्ण जन्म के समय विशेष पूजा की जाती है। इसे ‘निशीथ काल’ कहा जाता है।

Janmashtami 2025 में पूजा के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार रहेगा:

इस अवधि में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म होने के बाद, उनकी प्रतिमा को स्नान कराकर, वस्त्र पहनाकर, श्रृंगार करके पूजा-अर्चना की जाती है।

जो लोग पूरे दिन का व्रत रखते हैं, वे मध्यरात्रि की पूजा के बाद या अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि पारण शुभ मुहूर्त में ही हो।

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जन्माष्टमी 2025 पूजा विधि (Janmashtami 2025 Puja Vidhi)

Janmasthami के दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा विधि विधान से की जाती है। यहां एक विस्तृत पूजा विधि दी गई है जिसका पालन करके आप अपने घर में भगवान कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं:

व्रत और संकल्प:

जन्माष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर को साफ करें।

पूजा स्थल की तैयारी:

घर के मंदिर को फूलों और रंगोली से सजाएं। एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।

जन्माष्टमी झाँकी:

कई भक्तगण जन्माष्टमी पर विशेष झाँकी भी सजाते हैं, जिसमें गोकुल, वृंदावन, कारागार आदि के दृश्य बनाए जाते हैं।

यह पर्व के उत्साह को और बढ़ा देता है।

लड्डू गोपाल का स्नान:

रात्रि में निशीथ काल में पूजा से पहले, लड्डू गोपाल को पंचामृत  से स्नान कराएं।

तिलक :

चंदन और रोली का तिलक लगाएं।

दीपक प्रज्वलित करें:

घी का दीपक और धूपबत्ती जलाएं।

पुष्प और भोग:

भगवान को ताजे फूल, तुलसी के पत्ते अर्पित करें।

भोग में माखन-मिश्री, पंजीरी, धनिये की पंजीरी, खीर, फल और पंचामृत विशेष रूप से

मंत्र जाप और आरती:

भगवान कृष्ण के मंत्रों का जाप करें, जैसे “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” या “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे”। अंत में भगवान कृष्ण की आरती गाएं।

झूला झुलाना:

कई स्थानों पर, श्रीकृष्ण को पालने में झुलाने की परंपरा भी है।

यह उनके बाल रूप के प्रति प्रेम को दर्शाता है।

जन्मकथा का पाठ:

जन्माष्टमी की रात भगवान कृष्ण के जन्म से संबंधित कथाओं का पाठ करें या सुनें।

प्रसाद वितरण और पारण:

पूजा समाप्त होने के बाद, प्रसाद सभी में वितरित करें।

अगले दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें।

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जन्माष्टमी का महत्व (Significance of Janmashtami)

Janmashtami 2025 का पर्व सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इसके गहरे आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व भी हैं:

अधर्म पर धर्म की विजय:

जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म का प्रतीक है,

जिन्होंने कंस जैसे अधर्मी शासक का नाश किया और धर्म की स्थापना की।

प्रेम और भक्ति का संदेश:

भगवान कृष्ण का जीवन प्रेम, भक्ति और निःस्वार्थ कर्म का प्रतीक है।

उनकी लीलाएं हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं से प्रेम करना और कर्तव्यनिष्ठ होना सिखाती हैं।

सद्भाव और एकता:

यह त्योहार सभी धर्मों और समुदायों के लोगों को एक साथ लाता है।

विभिन्न स्थानों पर दही हांडी जैसे आयोजन होते हैं

कर्मयोग का सिद्धांत:

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण द्वारा दिया गया कर्मयोग का सिद्धांत हमें

फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा देता है।

बाल लीलाओं का आनंद:

भगवान कृष्ण के बाल रूप की पूजा हमें पवित्रता, सरलता और निश्छल प्रेम का महत्व सिखाती है।

पारिवारिक मूल्यों का संवर्धन:

यह त्योहार परिवारों को एक साथ लाता है। बच्चे भगवान कृष्ण की वेशभूषा धारण करते हैं

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